Sanskrit Shloka in Hindi | प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक अर्थ सहित

नमस्कार दोस्तों क्या आप Sanskrit Shloka और उसके अर्थ ढूंढ़ रहे हे। अगर ढूंढ़ रहे हे तो इस लेख में हम 25 से भी ज्यादा Sanskrit Shloka With Meaning प्रदान किया है।

संस्कृत भाषा, दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक, उत्तरी भारत में कई आधुनिक भाषाओं की पूर्वज है। संस्कृत को हिंदू धर्म में प्राचीन भाषा के रूप में माना जाता है।

जहां इसे हिंदू आकाशीय देवताओं और फिर इंडो-आर्यों द्वारा संचार और संवाद के साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया था। जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म में भी संस्कृत का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

निचे हम 25 से भी ज्यादा संस्कृत श्लोक और उनके अर्थ प्रदान किये हे। पूरा लेख को ध्यान से पढ़े Sanskrit Shloka और उनके Meaning को समझने को कोसिस करे।

Sanskrit Shloka With Meaning in Hindi

Sanskrit Shloka
Sanskrit Shloka

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।
यत्र तास्तु न पूज्यंते तत्र सर्वाफलक्रियाः ॥

अर्थ – जहाँ पर हर नारी की पूजा होती है वहां पर देवता भी निवास करते हैं। और जहाँ पर नारी की पूजा नहीं होती, वहां पर सभी काम करना व्यर्थ है।

Sanskrit Shloka in Hindi
Sanskrit Shloka in Hindi

स्वस्तिप्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः।
गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु॥

अर्थ – सभी लोगों की भलाई शक्तिशाली नेताओं द्वारा कानून और न्याय के साथ हो। सभी दिव्यांगों और विद्वानों के साथ सफलता बनी रहे और सारा संसार सुखी रहे।

Sanskrit Shloka
Sanskrit Shloka

तुलसी श्रीसखि शिवे शुभे पापहारिणी पुण्य दे।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥

अर्थ – हे तुलसी ! तुम लक्ष्मी की सहेली, कल्याणप्रद, पापों का हरण करने वाली तथा पुण्यदात्री हो। नारायण भगवान के मन को प्रिय लगने वाली आपको नमस्कार है। दीपक के प्रकाश को मेरे पापों को दूर करने दो, दीपक के प्रकाश को प्रणाम।

Best Sanskrit Shloka in Hindi
Best Sanskrit Shloka in Hindi

यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् ।
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥

अर्थ – ऐसे व्यक्ति जो विभिन्न देशो में यात्रा करते है और विद्वान लोगो की सेवा करते है, उनकी बौद्धिक क्षमता का विस्तार ठीक उसी तरह से होता है, जिस प्रकार तेल का एक बून्द पानी में गिरने के बाद फैल जाता है।

स्वगृहे पूज्यते मूर्खः स्वग्रामे पूज्यते प्रभुः।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान्सर्वत्र पूज्यते ॥

अर्थ – एक मुर्ख की पूजा उसके घर में होती है, एक मुखिया की पूजा उसके गाँव में होती है, राजा की पूजा उसके राज्य में होती है और एक विद्वान की पूजा सभी जगह पर होती है।

सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥

अर्थ – जो सब अन्यों के वश में होता है, वह दुःख है। जो सब अपने वश में होता है, वह सुख है। यही संक्षेप में सुख एवं दुःख का लक्षण है।

आदि देव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर:।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥

अर्थ – हे आदिदेव भास्कर! (सूर्य का अन्य नाम भास्कर है), आपको प्रणाम है, आप मुझ पर प्रसन्न हो, हे दिवाकर! आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर! आपको प्रणाम है।

कार्यार्थी भजते लोकं यावत्कार्य न सिद्धति ।
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् ॥

अर्थ – जब तक किसी व्यक्ति का कार्य पूरा नहीं होता है तब तक वह दूसरों की प्रशंसा करते हैं और जैसे ही कार्य पूरा हो जाता है, लोग दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं | यह ठीक उसी तरह होता है जैसे-नदी पार करने के बाद नाव का कोई उपयोग नहीं रह जाता है | कहनें का आशय यह है कि अपना स्वार्थ सिद्ध हो जानें पर उस व्यक्ति को भूल जाते है |

Sanskrit Slokas With Meaning

Sanskrit Shloka Hindi
Sanskrit Shloka Hindi

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

अर्थ – जिनका हृदय बड़ा होता है, उनके लिए पूरी धरती ही परिवार होती है और जिनका हृदय छोटा है, उनकी सोच वह यह अपना है, वह पराया है की होती है।

अनारम्भस्तु कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम्।
आरब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम्॥

अर्थ – कार्य शुरु न करना बुद्धि का पहला लक्षण है। शुरु किये हुए कार्य को समाप्त करना बुद्धि का दूसरा लक्षण है।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थ – हे घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर, करोड़ों सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करें।

प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक

अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यम निष्ठुर वचनम।
पश्चतपश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च।।

अर्थ – किसी का भी अनादर कर देना अर्थात कठोर वचन बोलकर देना, मुंह फेर कर देना, देरी से देना और देनें के पश्चाताप होना यह सभी पांच क्रियाएं दान को दूषित कर देती है।

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्, मा स्वसारमुत स्वसा।
सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥

अर्थ – भाई अपने भाई से कभी द्वेष नहीं करें, बहन अपनी बहन से द्वेष नहीं करें, समान गति से एक दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए परस्पर मिल-जुलकर कर्मों को करने वाले होकर अथवा एकमत से प्रत्येक कार्य करने वाले होकर भद्रभाव से परिपूर्ण होकर संभाषण करें।

उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः।
उत्थानेन महेन्द्रेण श्रैष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च॥

अर्थ – देवों ने भी प्रयत्नों से ही अमृत प्राप्त किया था, प्रयत्नों से ही असुरों का संहार किया था, तथा देवराज इन्द्र ने भी प्रयत्न से ही इहलोक और स्वर्गलोक में श्रेष्ठता प्राप्त की थी।

छोटा संस्कृत स्लोक

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः।

अर्थ – अहिंसा (मे) दृढ़ स्थिति हो जाने पर उस (योगी के) निकट (सब का) वैर छूट जाता है।

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।

अर्थ – सभी दिशाओं से नेक विचार मेरी ओर आएँ।

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः।

अर्थ – निरंतर अभ्यास से प्राप्त​ निश्चल और निर्दोष विवेकज्ञान हान(अज्ञानता) का उपाय है।

Sanskrit Quotes With Meaning in Hindi

सत्य -सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः।
सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥

अर्थ – उस संसार में सत्य ही ईश्वर है धर्म भी सत्य के ही आश्रित है, सत्य ही सभी भाव-विभव का मूल है, सत्य से बढ़कर और कुछ भी नहीं है।

आरोप्यते शिला शैले यथा यत्नेन भूयसा।
निपात्यते सुखेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः॥

अर्थ – जैसे कोई पत्थर बड़े कष्ट से पहाड़ के ऊपर पहुँचाया जाता है पर बड़ी आसानी से नीचे गिर जाता है, वैसे ही हम भी अपने गुणों के कारण ऊँचे उठते हैं। किंतु हम एक ही दुष्कर्म से आसानी से गिर सकते हैं।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।

अर्थ – ऐसे माता-पिता या अभिभावक जो अपन बच्चों को नहीं पढ़ाते है अर्थात शिक्षा अध्ययन के लिए नहीं भेजते है वह अपनें बच्चों के लिए एक शत्रु के समान है | जिस प्रकार विद्वान व्यक्तियों की सभा में एक निरक्षर व्यक्ति को कभी सम्मान नहीं मिल सकता वह हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है |

जीबन पर संस्कृत श्लोक

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद् गजभूषणं।
चातुर्यम् भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणं।।

अर्थ – एक घोड़े की शोभा उसकी तेज दौड़ने की गति से होती है और हाथी की शोभा उसकी मदमस्त चाल से होती है। एक स्त्री की शोभा कार्यों में दक्षता के कारण और पुरुषों की उनकी उद्योगशीलता के कारण होती है।

न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:।
काक:सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।

अर्थ – दुष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों को दूसरों की निंदा किए बिना आनंद नहीं आता है जैसे कौवा सब रसों का भोग करता है परंतु गंदगी भी जाए बिना उससे रहा नहीं जाता है।

विवादो धनसम्बन्धो याचनं चातिभाषणम् ।
आदानमग्रतः स्थानं मैत्रीभङ्गस्य हेतवः॥

अर्थ – वाद-विवाद, धन के लिये सम्बन्ध बनाना, माँगना, अधिक बोलना, ऋण लेना, आगे निकलने की चाह रखना यह सब मित्रता के टूटने में कारण बनते हैं।

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्, मा स्वसारमुत स्वसा।
सम्यञ्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥

अर्थ – भाई अपने भाई से कभी द्वेष नहीं करें, बहन अपनी बहन से द्वेष नहीं करें, समान गति से एक दूसरे का आदर-सम्मान करते हुए परस्पर मिल-जुलकर कर्मों को करने वाले होकर अथवा एकमत से प्रत्येक कार्य करने वाले होकर भद्रभाव से परिपूर्ण होकर संभाषण करें।

मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति ।
अपि निर्वाणमायाति नानलो याति शीतताम् ॥

अर्थ – स्वाभिमानी लोग अपमानजनक जीवन के जगह में मृत्यु पसंद करते हैं। आग बुझ​ जाती है लेकिन कभी ठंडी नहीं होती।

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्।।

अर्थ – मनुष्य को ज्ञान से ही विनम्रता प्रदान होती है, विनम्रता से ही योग्यता आती है और योग्यता से ही धन की प्राप्ति होती है, जिससे व्यक्ति धर्म के कार्य करता है और सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करता है।

मुझे आशा है आपको ये Sanskrit Shloka With Meaning लेख अच्छा लगा होगा। अगर अच्छा लगा हो तो अपके दोस्तो और आपके क्लासमेट के पास शेयर करे। अगरगर Sanskrit Shloka की Meaning में कुछ सबाल हे तो कमेन्ट में जरूर पूछे। धन्यवाद

Hii, Welcome to Odisha Shayari, I am Rajesh Pahan a Hindi Blogger From the Previous 3 years.

Leave a Comment